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कबीरदास के दोहे की गहराई मे गोता लगाने वाले को ज्ञानरूपि अमृतफल प्राप्त हो जाता है

परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा गांव तोछीगढ़ में हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के निर्गुण शाखा के ज्ञानमार्गी महानतम कवि व महान समाज सुधारक एवं पथप्रदर्शक संत कबीरदास जी की जयंती मनाई गई। ग्रामीण बच्चों ने कबीरदास के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने कहा कबीरदास जी 15वीं सदी के रहस्यवादी कवि और संत थे। वे हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन युग में परमेश्वर की भक्ति के लिए एक महान प्रवर्तक के रूप में उभरे। वे एक सर्वोच्च ईश्वर में विश्वास रखते थे। वह मूर्ति पूजा, रोज़ा आदि में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने सामाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना भी की।
कबीरदास का जन्म संवत् 1455 में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी में हुआ था। कबीर दास जी के दोहे उन तमाम कुरीतियों और असमानताओं पर कड़ा प्रहार है जिसने हमारे समाज को बुरी तरह जकड़ कर रखा है। इनके दोहे हर युग मे प्रासंगिक हैं कबीरदास के दोहे उस युग में लिखे गए थे जब समाज में धार्मिक एवं सामाजिक भेदभाव के अतिरिक्त बहुत तरह की भेदभावना व्याप्त थीं। कबीर साहेब के दोहे समाज को आईना दिखाने का काम करते रहे हैं। संत कबीर के दोहे लोगों मे व्याप्त हीन भावना को समझने और समाप्त करने का सफल प्रयास है। कबीरदास के दोहे की गहराई मे गोता लगाने वाले को ज्ञानरूपि अमृतफल प्राप्त हो जाता है। इनके दोहे और पदों मे लौकिक और पारमार्थिक दो अर्थ निकलते हैं। संत कबीर दास जी के दोहे के गूढ़ अर्थ को समझने के लिए लौकिक और पारमार्थिक दोनों दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। कबीर दास जी दोहे सामान्यजन से लेकर विद्वतजन तक सबके लिए प्रेरणादायी हैं। कबीर दास जी को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। कबीर दास जी अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज भी पूज्यनीय हैं। कबीर दास जी सिर्फ मानव धर्म में विश्वास रखते थे। इस अवसर पर रामप्रकाश सिंह ठैनुआं, नरेंद्र सिंह, रवि कुमार, गौरव चौधरी, गोपाल सिंह, सूरज सिंह, प्रियांशु ठैनुआं, आर्यन ठैनुआं, प्रशांत ठैनुआं, करन ठैनुआं, सूरज, साधना आदि मौजूद रहे।

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