फिल्म, फितूर और फौरन विरोध? अपच का राष्ट्रीय महोत्सव
देश में फिल्मों का बनना जितना पुराना है, उतना ही पुराना है उनका विरोध। फर्क बस इतना आया है कि पहले लोग फिल्म देखकर सोचते थे, अब बिना देखे ही नाराज हो जाते हैं। मानो विरोध करना भी एक प्रकार का “राष्ट्रीय खेल” हो गया हो, जिसमें भाग लेने के लिए न टिकट चाहिए, न जानकारी, सिर्फ थोड़ा-सा उत्साह और ढेर सारी पूर्वाग्रह की पूंजी काफी है। आजकल फिल्मों के साथ एक नया ट्रेंड जुड़ गया है “रिलीज से पहले ही विरोध”। जैसे ही किसी फिल्म का पोस्टर आया नहीं कि कुछ लोगों का पेट दर्द शुरू। ट्रेलर आते ही यह दर्द गैस, एसिडिटी और फिर अपच में बदल जाता है। और जब तक फिल्म रिलीज हो, तब तक यह अपच आंदोलन का रूप ले लेती है। हाल के वर्षों में कई ऐसी फिल्में आईं, जिनका विरोध उतनी ही तेजी से हुआ, जितनी तेजी से उनका प्रचार। विरोध करने वालों का तर्क भी बड़ा दिलचस्प होता है, हमने फिल्म नहीं देखी, लेकिन हमें पता है कि इसमें गलत दिखाया गया है। यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर बिना मरीज को देखे ही ऑपरेशन का विरोध कर दे।
अब बात करें उस बहुचर्चित फिल्म की, जिसका पहला भाग आते ही देश में विचारों का तूफान खड़ा हो गया था, धुरंधर-1। कुछ लोगों ने इसे एकतरफा बताया, कुछ ने इसे साहसिक कहा, और कुछ ने बिना देखे ही इसे खारिज कर दिया। लेकिन सबसे रोचक बात यह रही कि जिन लोगों के बारे में कहा गया कि उन्हें यह फिल्म बुरी लगेगी, उन्होंने ही इसे सराहा। इससे उन लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया, जो विरोध के सहारे अपनी पहचान बनाना चाहते थे। फिल्म का दूसरा भाग आया तो लगा कि अब शायद लोग कहानी पर ध्यान देंगे। लेकिन नहीं, इस बार भी वही पुराना राग यह फिल्म हमारे खिलाफ है, यह हमारी भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है, इसे बैन करो। मानो फिल्में अब मनोरंजन का माध्यम न होकर भावनाओं की परीक्षा बन गई हों। सबसे मजेदार पहलू यह है कि फिल्म में किसी किरदार को लेकर आपत्ति जताई जाती है। कहा जाता है कि उसका चित्रण गलत है, अतिरंजित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या फिल्में डॉक्यूमेंट्री होती हैं? क्या हर किरदार को हूबहू वास्तविकता के अनुसार ही दिखाना अनिवार्य है? यदि ऐसा हो जाए, तो रचनात्मकता का क्या होगा? फिर तो हर लेखक और निर्देशक को पहले अदालत से अनुमति लेनी पड़ेगी सर, क्या मैं यह सीन बना सकता हूं?
कुछ लोगों को यह भी परेशानी होती है कि फिल्म में अपराधी को अपराधी क्यों दिखाया गया। अब यह तो नई बात है! अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में गलत कामों के लिए जाना जाता है, तो उसे फिल्म में संत का दर्जा दे दिया जाए? क्या इससे इतिहास बदल जाएगा? या फिर सच छिपाने से वह सच रहना बंद हो जाएगा? दरअसल, समस्या फिल्म में नहीं, देखने के नजरिए में है। आजकल हर चीज को अपने चश्मे से देखने की आदत पड़ गई है। अगर कोई फिल्म हमारी सोच से मेल खाती है, तो वह सच्चाई है, और अगर नहीं मिलती, तो वह प्रोपेगेंडा। यह चयनात्मक सत्य की नई परिभाषा है।
विरोध करने वालों की एक खासियत और होती है वे हमेशा जनता की बात करते हैं, लेकिन जनता ने उन्हें यह जिम्मेदारी कब दी, यह कोई नहीं जानता। वे खुद ही तय कर लेते हैं कि कौन-सी फिल्म देखनी चाहिए और कौन-सी नहीं। मानो वे देश के सांस्कृतिक संरक्षक हों, जिन्हें हर कहानी में खतरा नजर आता है। इंटरनेट मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और हवा दी है। अब कोई भी व्यक्ति दो ट्वीट लिखकर खुद को विचारक समझने लगता है। बिना तथ्य, बिना तर्क सिर्फ भावनाओं के सहारे बहस चलती रहती है। और सबसे बड़ी बात, जितना ज्यादा शोर, उतनी ज्यादा लोकप्रियता। फिल्म वालों के लिए यह मुफ्त का प्रचार बन जाता है, और विरोध करने वालों के लिए मुफ्त की पहचान। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान किसका होता है? दर्शकों का। क्योंकि वे असली बहस से दूर हो जाते हैं फिल्म की कहानी, अभिनय, निर्देशन और संदेश। इन सब पर चर्चा करने की बजाय बहस इस बात पर होती है कि किसे बुरा लगा और क्यों लगा। हकीकत यह है कि फिल्में समाज का आईना होती हैं, लेकिन हर आईना हर व्यक्ति को पसंद नहीं आता। कुछ लोग उसमें अपनी सूरत देखकर खुश होते हैं, तो कुछ उसे तोड़ देना चाहते हैं। लेकिन आईना तो आईना ही रहेगा, वह वही दिखाएगा, जो उसके सामने होगा।
विरोध करना गलत नहीं है, लेकिन बिना समझे विरोध करना जरूर गलत है। यह न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है, बल्कि दर्शकों के अधिकारों का भी हनन है। हर व्यक्ति को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वह क्या देखना चाहता है और क्या नहीं। अंत में यही कहा जा सकता है कि फिल्मों से ज्यादा दिलचस्प उनका विरोध हो गया है। अब लोग फिल्म देखने से पहले यह देखना चाहते हैं कि उस पर कितना विवाद हुआ है। और अगर विवाद ज्यादा है, तो समझ लीजिए फिल्म हिट होने की आधी राह पार कर चुकी है। तो अगली बार जब कोई फिल्म आए और उसका विरोध शुरू हो जाए, तो घबराइए मत। यह हमारे समय का नया ट्रेंड है, पहले विरोध, फिर विचार। और जहां तक अपच का सवाल है, उसके लिए दवा बाजार में उपलब्ध है, लेकिन सोच की अपच का इलाज अभी तक नहीं मिला है।