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एक ऐसा वीर जिसने पाकिस्तानी फौज में मचा दी थी भगदड़

इगलास। परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा आज देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित, अदम्य शौर्य और पराक्रम की परिभाषा अमर शहीद वीर अब्दुल हमीद जी की 90 वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने बताया कि वीर अब्दुल हमीद ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान खेमकरण सैक्टर में अद्भुत वीरता और अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए वीरगति प्राप्त की थी। इस युद्ध में असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें पहले महावीर चक्र और फिर मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया।

अब्दुल हमीद का जन्म गाजीपुर के धामूपुर में 1 जुलाई 1933 को एक साधारण परिवार में हुआ था। अब्दुल हमीद 1954 को भारतीय सेना के ग्रेनेडियर रेजीमेंट में भर्ती हुए। बाद में उनकी तैनाती रेजीमेंट के 4 ग्रेनेडियर बटालियन में हुई जहां उन्होंने अपने सैन्य सेवा काल तक अपनी सेवाएं दीं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी अब्दुल हमीद और इनके सभी साथियों ने पीपल्स लिबरेशन आर्मी से लोहा लिया था। 1965 में भारत में अस्थिरता उत्पन्न करने और शासन-व्यवस्ता के खिलाफ विद्रोह भड़काने की अपनी योजना ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ के तहत पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में जम्मू-कश्मीर में लगातार घुसपैठ करने की गतिविधियां शुरू कर दीं थीं। पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए गुरिल्ला हमले की योजना बनाई थी। 8 सितम्बर 1965 की रात में, पाकिस्तान द्वारा अपराजेय अमेरिकन पैटन टैंकों द्वारा भारत पर हमला किया गया जिसका जबाव देने के लिए वीर अब्दुल हमीद पंजाब के खेमकरण सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे। उस समय भारतीय सैनिकों के पास न तो टैंक थे और नहीं बड़े हथियार लेकिन उनके पास था भारत माता की रक्षा के लिए लड़ते हुए मर जाने का हौसला। हवलदार अब्दुल हमीद के पास “गन माउनटेड जीप” थी जो पैटन टैंकों के सामने मात्र एक खिलौने के सामान थी। अब्दुल हमीद ने अपनी जीप में बैठ कर अपनी गन से पैटन टैंकों के कमजोर अंगों पर एकदम सटीक निशाना लगाकर एक -एक कर धवस्त करना प्रारम्भ कर दिया। उनको ऐसा करते देख अन्य सैनकों का भी हौसला बढ़ गया और देखते ही देखते पाकिस्तान फ़ौज में भगदड़ मच गई। अब्दुल हमीद ने अपनी “गन माउनटेड जीप” से सात पाकिस्तानी पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया था। इसी युद्ध के दौरान पाकिस्तानी फौज का एक गोला उस जीप पर आके गिरा और वीर अब्दुल हमीद बुरी तरह से घायल हो गए। अगले दिन 9 सितंबर 1965 को भारत मां का यह सच्चा सपूत देश की बलिबेदी को नमन करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गया। आज भी सारा देश उनकी बहादुरी को नमन करता है। इस अवसर पर रामबाला सिंह, मूलचंद सविता, राजेन्द्र सिंह, दिनेश कुमार, अजय कुमार, उपेन्द्र सिंह, विमल कुमार, मुकेश कुमार, प्रवीण, सूरज, साधना आदि मौजूद रहे।

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