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भागवत कथा श्रवण से मिटते हैं जन्मों के पाप : वृंदा किशोरी

मथुरा। वृंदावन के पावन परिक्रमा मार्ग स्थित श्यामधाम कॉलोनी के मां लीलावती आश्रम में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के द्वितीय दिवस पर भक्ति की अविरल धारा बही। कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहाँ बाल व्यास दीदी वृंदा किशोरी एवं बृज किशोर महाराज ने अपनी मधुर वाणी से भागवत महात्म्य और द्वितीय दिवस के प्रसंगों का सजीव वर्णन किया।

श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यास पीठ से दीदी वृंदा किशोरी ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में सदैव परोपकार की भावना अपनानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि वही जीवन सार्थक है जो दूसरों के काम आए। “परहित सरिस धर्म नहिं भाई” का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, उसी प्रकार ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दूसरों की सेवा के लिए दिया है।

सती चरित्र और ध्रुव भक्ति का प्रसंग

कथा के क्रम को आगे बढ़ाते हुए बृज किशोर महाराज ने द्वितीय दिवस के मुख्य प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने सती चरित्र, शिव-पार्वती विवाह और भक्त ध्रुव की कथा सुनाई। महाराज श्री ने बताया कि कैसे बालक ध्रुव ने अपनी सौतेली माँ के वचनों से आहत होकर मात्र पांच वर्ष की अल्पायु में ही कठिन तपस्या कर भगवान नारायण को प्रसन्न कर लिया। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य के मन में दृढ़ संकल्प और अटूट विश्वास हो, तो परमात्मा को प्राप्त करना कठिन नहीं है। ध्रुव की भक्ति हमें सिखाती है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रता और धैर्य अनिवार्य है।

श्रीमद्भागवत का महत्व

व्यास पीठ से कहा गया कि श्रीमद्भागवत साक्षात श्रीकृष्ण का वांग्मय स्वरूप है। इसके श्रवण मात्र से मनुष्य के कई जन्मों के संचित पापों का विनाश हो जाता है। भागवत कथा हमें जीवन जीने की कला सिखाती है और मोह-माया के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करती है।

श्रद्धालुओं की रही भारी उपस्थिति

कथा के दौरान भजनों पर श्रद्धालु भावविभोर होकर झूम उठे। कार्यक्रम में मुख्य यजमान मयंक शर्मा व नीलम शर्मा ने सपरिवार भागवत जी की आरती उतारी और आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर संजय गोस्वामी, अंकित अग्रवाल, अरविंद शर्मा, पुष्पा देवी, सुधा माझी, लालू यादव सहित बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी और दूर-दराज से आए श्रद्धालु उपस्थित रहे। कथा के अंत में सभी भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया। आश्रम का वातावरण ‘राधे-राधे’ के जयघोष से गुंजायमान रहा।

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