सहारा खुर्द में है गुप्ततीर्थ स्थल, शिवपुत्र कार्तिकेय ने की थी स्थापना
इगलास। यह ब्रज है। भगवान श्रीकृष्ण का धाम। चारों धामों से निराला। अनेक देवताओं के चरण भी यहां पड़े। तभी तो ब्रज रज हर किसी की आस्था और श्रद्धा से जुड़ी है। आज भी कहीं श्रीकृष्ण के पदचिह्न मौजूद हैं तो कहीं रास स्थली, क्रीड़ा स्थली। श्रीकृष्ण जन्मभूमि की जेल और उनकी अंगुली पर उठाया गया गोवर्धन पर्वत। ब्रज आएं और तीर्थ स्थलों पर न जाएं, तो यात्रा ही अधूरी लगेगी। ब्रज में तीर्थ स्थल तो अनेक हैं, लेकिन गुप्त तीर्थ स्थल अलीगढ़ जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर इगलास में ही है। यहां के गांव सहारा खुर्द स्थित शिव मंदिर में एक नहीं तीन शिवलिंग हैं, जिनकी स्थापना कार्तिकेय ने कराई और अपने पिता भगवान शिव की आराधना की। ऐसा शिवभक्त ताड़कासुर वध का प्रायश्चित करने के लिए किया। एक श्राप के चलते स्थल को गुप्त तीर्थ स्थल नाम से पहचान मिली। इस स्थल पर प्रस्तुत है रिपोर्ट ………
बात प्राचीन काल की है। पुराणों के अनुसार ताड़कासुर राक्षस से सब परेशान थे। ताड़कासुर को बरदान था कि उसकी मृत्यु भगवान के शिव के पुत्र के हाथों ही होगी। बरदान मिलने के बाद उसने आतंक मचाना प्रारंभ कर दिया। उसके आतंक से देवता भी भयभीत हो गए। उसे मारने के लिए शिवपुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। बताया जाता है कि गंगा-युमना के बीच देवताओं और राक्षशों में भयंकर युद्ध हुआ। युद्ध में कार्तिकेय ने ताड़कासुर का बध कर दिया। वध होने से ताड़कासुर के आतंक से ऋषि मुनियों को मुक्ति तो मिली, लेकिन कार्तिकेय परेशान थे। ताड़कासुर उनके पिता भगवान शिव के भक्त थे। इसकी जानकारी होने पर कार्तिकेय ने शिवभक्त को मारने का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया और कार्तिकेय ने भगवान विश्वकर्मा से तीन विशुद्ध शिवलिंगों का निर्माण कराया। इसी स्थान पर कार्तिकेय ने तीनों शिवलिंग कुमारेश्वर, प्रतिज्ञेश्वर व कपिलेश्वर की स्थापना की, जिनके कुछ ही दूरी पर अलग-अलग मंदिर बनाए गए। तीनों शिवलिंग जमीन के कितने अंदर है इसकी कोई थाह नहीं है। ये आज भी हैं, पर उस समय बनाया गया मंदिर नया रूप ले चुका है। पुराने कुछ पत्थर और बनावट तब कला के प्रमाण हैं। शिवलिंगों के प्रति आस्था ब्रज क्षेत्र के अलावा अन्य जिलों व प्रदेशों के लोगों में भी है। यही वजह है कि हर साल यहां लगने वाले मेला में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हजारों में रहती है।
पुराणों में है उल्लेख
तीनोंं शिव लिंग कुछ ही दूरी पर हैं। प्रत्येक शिवलिंग की ऊंचाई चार से पांच फुट है। मंदिर के महंत बाबा मोहनगिरी बताते हैं कि शिव भक्त का बध करने के कारण कार्तिकेय को शांति नहीं मिल रही थी। कार्तिकेय ने विचार किया जिस क्षण उन्होंने शिव भक्त का बध करने का निर्णय लिया उन्हें उसी वक्त मानसिक पाप लग गया। जिस वक्त उन्होंने वध के लिए निमित शक्ति फेंकी वह राक्षश के सर पर लगी उससे उन्हें पापा लगा। यह कायिप पाप कहलाया। जहां अचेत शरीर गिरा और उसका वास्तविक वध हुआ वह नैमित्तिक पाप लगा। तीनों पापों के प्रायश्चित के लिए कार्तिकेय ने संकल्प लेने वाले स्थान पर प्रतिज्ञेश्वर, जहां से शक्ति फेंक और राक्षस के मस्तक पर लगी वहां कपालेश्वर और जहां निर्जीव शरीर गिरा वहां कुमारेश्वर लिंग की स्थापना की। कुमारेश्वर की सबसे अधिक मान्यता है। यह एक गुप्त तीर्थस्थल है। इसका उल्लेख शिवपुराण, भागवत पुराण, स्कंदपुराण व विश्वकर्मा पुराण में मिलता है।
इसलिए मिला श्राप
गांव सहारा खुर्द स्थित शिव मंदिर को गुप्त तीर्थ स्थल के नाम से जाना जाता है। मंदिर के महंत बाबा मोहनगिरी के अनुसार यह तीर्थ स्थल श्राप के चलते अधिक प्रख्यात नहीं हो सका। विश्वकर्मा पुराण के अनुसार जब कार्तिकेय ने प्रायश्चित करने के लिए सभी तीर्थों को यहां बुलाया तो ब्रह्मा जी ने उक्त तीर्थ को बरदान दिया कि इस तीर्थ का पूजन सभी तीर्थों के बराबर होगा। बरदान मिलने के बाद तीर्थ को अभिमान हो गया। तीर्थ ने अपने अभिमान के चलते अपने मुंह से अपनी बढ़ाई करना प्रारंभ कर दिया। जिससे अन्य तीर्थ लज्जित होने लगे। तीर्थ के अभिमान को देखकर धर्मराज ने उसे श्राप दे दिया कि कलियुग में यह तीर्थ गुप्ता रहेगा और इसकी महिमा अन्य तीर्थों की तरह प्रसिद्धि नहीं पा सकेगा। अपने द्वारा स्थापित तीर्थ को श्राप मिलने पर कार्तिकेय नाराज हो गए। भगवान विष्णु ने समस्या का हल निकालने हुए धर्मराज से श्राप में परिवर्तन करने को कहा। विष्णुजी के कहने पर धर्मराज ने कहा कि यहां जो स्तम्भ हैं उनका नाश नहीं होगा लेकिन कलियुग में यह तीर्थ गुप्त रहेगा।
यहां होती है भै माता की पूजा
बचपन में जब बच्चे रोते हैं तो कहा जाता है कि भै माता इसे रुला रही है। ब्रज में मान्यता है कि भै माता ही भाग्य लिखती है। देश में यह अकेला ऐसा मंदिर हैं, जिसमें भगवान शिव के साथ भै माता की पूजा की जाती है। कुमारेश्वर महादेव के साथ ही मंदिर में एक स्तम्भ है जिसे भै माता कहा जाता है। इसके अलावा मंदिर में महाबली भगवान हनुमान, शनिदेव, मां दुर्गा, मां काली की मूर्तियां भी हैं।
महाशिव रात्रि पर लगता है मेला
शिव मंदिर पर हर रोज पूजा की जाती है। इसके लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। महाशिव रात्रि पर यहां मेला लगता है। गंगाघाट से कावड़ में गंगाजल लाकर यहां अभिषेक किया जाता है। श्रावण मास के सोमवार को भी यहां दर्शन व अभिषेक करने के लिए श्रद्धालुओं की कतार लगती है।
पार्वती सरोवर में किया था स्नान
शिवलिंग के साथ यहां एक सरोवर भी बनवाया। बताते हैं कि इसी सरोवर में कार्तिकेय ने सभी तीर्थों को प्रकट किया था। इसमें स्नान करने के बाद कार्तिक ने भगवान शिव की पूजा कर शिव भक्त को मारने का प्रायश्चित किया। यह सरोवर आज भी है, लेकिन स्वरूप बदहाल है। गांव के ही 70 वर्षीय शंकर सिंह बताते हैं कि पहले सरोवर में पानी रहता था और यहां सीढिय़ां भी बनी थी, लेकिन समय के साथ तालाब अपेक्षाओं का शिकार हो गया। वहीं गांव के 64 वर्षीय सूरजपाल सिंह बताते हैं कि पहले मंदिर ककईया ईंटों का बना था, अब स्वरु प बदल गया है। हमने बुजुर्गों से सुना है कि यहां कई लड़ाईयां भी हुई हैं। युग बदलने के साथ ही मंदिर अत्यंत जीर्ण हो गया होगा।