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अगर ताकत है तो अपना राज मुक्त कराओ

1857 की क्रांति के अमर बलिदानी राजा देवी सिंह आर्य जी के शहीद दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन

इगलास। परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा गांव तोछीगढ़ में 1857 की क्रांति के अमर बलिदानी राजा देवी सिंह आर्य जी के शहीद दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में ग्रामीण युवाओं ने राजा साहब के छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी और देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान करने का संकल्प भी लिया।

संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने अमर शहीद राजा देवी सिंह की जीवनी सुनाते हुए कहा कि राजा देवी सिंह जी का जन्म राया तहसील के अचरु ग्राम के एक जाट परिवार में हुआ था। राया की स्थापना उनके पूर्वज राजा रायसेन गोदर जी ने ही करवाई थी। मुगलों के समय उनका राज छीन लिया गया था जिसे पाने की कोशिश गोदर परिवार लंबे समय से कर रहे थे। राजा देवी सिंह एक बड़े तगड़े कुश्ती के पहलवान व बजरंग बली के भक्त थे। एक बार अखाड़े में गांव के किसी व्यक्ति ने उन पर ताना कसा कि इस गठीले व ताकतवर शरीर का क्या फायदा तुम्हारी भूमि पर तो गोरों का राज है ? अगर ताकत है तो अपना राज मुक्त कराओ। यह सब सुनकर देवी सिंह जी सुन्न हो गए। अगली सुबह उन्होंने अपने गांव व आस पास के जाटों को एकत्रित करके कहा कि अब फिर से पूर्वजों की भूमि को आजाद करवाना है और भारत माता को अंग्रेजों के चंगुल से छुटाना है वरना हमारा जीवन व्यर्थ है जो भी इस पवित्र कार्य में मेरी मदद करना चाहे व मेरे साथ आये। सब युवा एक स्वर में बोले कि हम आखिरी सांस तक तन मन धन से आपके साथ हैं। फिर देवी सिंह जी ने हथियार इकट्ठा करके एक सेना तैयार की। और 10 मई 1857 कोशुरू हुई क्रांति के दिन ही राया में विद्रोह कर दिया। राजा साहब ने आस पास के सब अंग्रेजो कि नींद उड़ा दी उनका खजाना कचहरी सब लूट लिया व क्रांतिकारियों और गरीबो में बांट दिया। उन्होंने अनेकों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। राया के सब अंग्रेज अधिकार भाग गए या मारे गए। राया के किले पर राजा देवी सिंह जी का कब्जा हो गया।

बल्लभगढ़ हरियाणा के क्रांतिवीर राजा नाहर सिंह जी के कहने पर दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर ने उन्हें राजा की पदवी आधिकारिक रूप से प्रदान कर दी थी। उनका राज लगभग एक साल तक खुलेआम चला। उनके राज्य में किसी अंग्रेज को घुसने नहीं दिया जाता था। अगर घुसता तो उसे काट दिया जाता था। उनकी ताकत बढ़ती देखकर अंग्रेजी सरकार परेशान हो गयी। इसलिये उन्होंने थोर्नबिल के नेतृत्व में आधुनिक हथियारों से लैस एक बड़ी सेना राया को जीतने के लिए भेज दी। राया राज्य के सब सैनिकों समेत राजा देवी सिंह जी ने उनका वीरता से सामना किया। भयंकर युद्ध चलता रहा। बहुत से अंग्रेज मारे गए एवं क्रांतिकारी शहीद हो गए।

इसी बीच राजा देवी सिंह जी के पास गोला बारूद खत्म हो गया। राजा व उनकी सेना ने बिना गोली बारूद के तलवार एवं लाठी, पत्थर आदि देशी हथियारों से ही मुकाबला शुरू कर दिया। बहुत से वीर शहीद हो गए तथा अंत में राजा साहब को बन्दी बना लिया गया और 15 जून 1858 को उन्हें सबके सामने खुलेआम फांसी पर लटका दिया गया। उन्होंने फांसी का फंदा चूमते हुए कहा कि जब तक भारतभूमि गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई है तब तक हथियार उठाये रखना भले ही कितने ही देवी सिंहों के रक्त की आहुति देनी पड़े। हमें हर हालात में स्वतंत्रता का यह यज्ञ सफल बनाना है। इस तरह 15 जून 1858 को भारत माता के एक सच्चे सपूत ने स्वतंत्रता की बलिबेदी पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। हमारे पूर्वजों ने कितने ही बलिदान मात्र इसलिए दिए थे कि हम सब खुली हवा में सांस ले सकें। इस अवसर पर मलिखान सिंह, दिनेश कुमार, उपेन्द्र कुमार, अन्नू, मोहन सिंह, प्रियांशु, आर्यन, अंकित, हर्ष, गोविंद, सूरज, कपिल, स्वप्निल आदि मौजूद रहे।

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