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समर्पण ही सच्ची भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है : अनंतदास

इगलास। श्रद्धा के बिना कोई भी धर्म-कर्म सफल नहीं होता। जब हृदय में भक्ति होती है, तब ही धर्मार्थ का हर प्रयास सार्थक बनता है। श्रद्धा केवल भगवान में नहीं, बल्कि कथा कहने वाले वक्ता, श्रोताओं और ब्राह्मणों में भी होनी चाहिए। जब भाव विनम्र हो और मन शुद्ध हो, तभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं और उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। उक्त प्रवचन कस्बा के अलीगढ़ मार्ग स्थित ओम गैस्ट हाउस में चल रही नौ दिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन कथा व्यास आचार्य अन्नतदास महाराज ने कहे।

उन्होंने श्रद्धालुओं को श्रद्धा और भक्ति का महत्व बताते हुए दिव्य प्रसंगों के साथ भगवान शिव और माता सती के प्रसंग का व्याख्या की। उन्होंने बताया कि दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियां गुणवान थीं, लेकिन फिर भी वे संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने ऐसी पुत्री की कामना की जो सर्वशक्तिमान और सर्वविजयी हो। इसके लिए उन्होंने कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर भगवती आद्या ने स्वयं सती रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। कथा व्यास ने कहा कि भगवान शिव की पूजा करने वाला व्यक्ति स्वयं को शिव को समर्पित कर देता है। यह समर्पण ही सच्ची भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। कथा में भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

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