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जयंती पर भारत माता के सच्चे सपूत नेताजी सुभाष चंद्र बोस को किया याद

इगलास। मंगलायतन विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ विजुअल एंड पर्फोमिंग आर्ट में राष्ट्रीय सेवा योजना के तत्वावधान में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई गई। विद्यार्थियों व स्वयंसेवकों ने नेताजी को श्रद्धांजलि देते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेकर देश सेवा का संकल्प लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ एनएसएस समन्वयक डा. पूनम रानी ने दीप प्रज्वलित करके किया। उन्होंने नेताजी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि नेताजी का देश की स्वतंत्रता में बड़ा योगदान है। उनके द्वारा दिए गए जय हिंद व तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा नारे आज भी स्मरणीय हैं। छात्र आकाश कुमार ने विस्तार से सुभाष चंद्र बोस की जीवनी सुनाते हुए उनके जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों का स्मरण कराया। इस अवसर पर डा. उन्नतिजादौन, डा. रामकृष्ण घोष, पं. देवाशीष चक्रवर्ती, अजय सिंह राठौर, डा. प्रेमलता आदि के साथ ही एनएसएस की यूनिट तीन व छह के स्वयं सेवक उपस्थित रहे।

एलबीके पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल इगलास में आजादी के महानायक सुभाष चंद्र बोस का “128वांजन्मदिवस” हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जिसमें राष्ट्र सेवा का संकल्प, कर्मठता, लगनशीलता के स्रोत सुभाष जी को नमन कर वक्ताओं ने उनके जीवन शैली व कार्यशैली पर अपने मंतव्य प्रकट किए। विद्यालय के प्रबंधक हरीमोहन अग्रवाल ने सुभाष चंद्र बोस के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए नमन किया तथा अपने वक्तव्य में कहा कि जन्मदिवस पर जलाया गया प्रकाश स्रोत दीपक हमारे दिलों में हमेशा जलता रहना चाहिए, जिससे हमारी आजादी की स्मृतियां हमारे दिलों में दीपक की भांति जीवित रहे और हम आजादी के प्रति देश हित समर्पित भाव रखें। प्रधानाचार्या रुबीना शाहीन ने सुभाष जी के कार्यशैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सुभाष चंद्र बोस का जीवन छात्रों एवं युवाओं के लिए सदैव अनुकरणीय है और रहेगा। जिस प्रकार नेताजी ने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करते हुए “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का नारा देकर देश प्रेम, एकता व भाईचारे की भावना के लिए हुंकार भरी थी, ऐसे महानायक का जीवन हमारे लिए सदैव प्रेरणा स्रोत बना रहेगा। कार्यक्रम में अनेक वक्ताओं ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कार्यशैली पर अपने-अपने विचार प्रकट किये तथा पुष्पांजलि भेंट कर आदर्श पुरुष को नमन किया। इस अवसर पर सीमा खुराना, राजेश कुमार, दुर्गेश उपाध्याय, प्रीति सिंह, लेखराज, प्रवेश अग्रवाल सहित समस्त शिक्षक गण उपस्थित रहे।

परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा गांव तोछीगढ़ में भारत माता के सच्चे सपूत “जय हिंद” जैसे जीवंत नारे का उदघोष करने वाले”आजाद हिन्द फौज” के सर्वोच्च सेनापति महान क्रान्तिकारीनेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की 128वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। जिसमें ग्रामीण युवाओं ने उनके जीवन चरित्र की व्याख्या कर उसका अनुसरण करने का संकल्प लिया। संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने कहा कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने मातृभूमि को स्वतंत्र कराने हेतु अपना सर्वस्वन्यौछावर कर दिया था। वह भारत की स्वंतत्रता के लिए जन्मे, जीवित रहे और अंतिम सांस तक संघर्ष करते रहे। उन्होंने विदेश में रह कर अपने दृढ़ संकल्प, अदम्य साहस, असीम त्याग और अद्भुत शौर्य द्वारा एक विशाल संगठन बनाकर विश्व में कर्म साधना का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया था। उनका चिंतन था कि अतिशय अहिंसा देश के पराभव के लिए उत्तरदाईहै। वह ‘दासता को मनुष्य के लिए सबसे पहला पाप मानते थे। नेताजी ने 4जुलाई 1943 को आजाद हिन्द फौज की कमान संभाली थी और उन्होंने रानी झांसी रेजीमेंट के नाम से महिला सैनिकों का भी एक अलग दल बनाया था। जिसमें नीरा आर्य समेत देश की सैकड़ों वीरांगनाओं ने अपना जौहर दिखाया था। देश उनके संघर्ष का सदैव ऋणीरहेगा। इस अवसर पर प्रियांशु ठैनुआं, प्रशांत, शशांक, करन, गौरव चौधरी, कुलदीप सिंह, आदित्य, विकास, सूरज, साधना आदि मौजूद रहे।

भारतीय किसान यूनियन व अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ने श्रद्धांजलि देते हुए नेताजी को याद किया। लक्ष्मी नारायण कौशिक ने कहा कि नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में भारत की अस्थाई सरकार की स्थापना की थी। मातृभूमि से अटूट प्रेम के कारण ही नेताजी का नाम भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। नेताजी महान लेखक, सैनिक, दार्शनिक, कुशल राजनीतिज्ञ एवम् प्रशासक, सेनानायक, ओजस्वी वक्ता व भविष्य दृष्टा के रूप में बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। हालांकि देश की आजादी के लिए उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना था लेकिन वह स्वभाव से आध्यात्मिक संत ही थे। इस अवसर पर चौ. हरपाल सिंह, डा. नृपतिदेव भारद्वाज, लक्ष्मी नारायण कौशिक, गोकुलचंद कटारा, नरेंद्र सिंह, अनोखेलाल शर्मा, सोवरन सिंह, वीरेंद्र सिंह, सुखवीर सिंह, महावीर सिंह टीटी, मुख्त्यार सिंह आदि थे।

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