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बेबस पिता की टूटी हिम्मत को सहारा, कन्यादान फाउंडेशन ने पूरी की बेटी की शादी की रस्म

गभाना। जीवन की कठोर सच्चाइयों से जूझ रहे हर पिता का सपना होता है कि वह अपनी बेटी को पूरे मान-सम्मान के साथ विदा करे। लेकिन जब गरीबी इस सपने की राह में दीवार बनकर खड़ी हो जाती है, तो हिम्मत जवाब देने लगती है। अलीगढ़ में तस्वीर महल के पास रहने वाले एक ऐसे ही परिवार के मुखिया के लिए, 25 नवंबर की तारीख खुशियों की बजाय चिंता का सबब बनी हुई थी। बेटी की शादी तय थी, पर घर की दयनीय आर्थिक स्थिति के चलते शादी की तैयारियों में बार-बार व्यवधान आ रहा था। पिता की आँखें उम्मीद और बेबसी के बीच झूल रही थीं।

संकट में मसीहा बनकर आया ‘कन्यादान सुमंगल फाउंडेशन’

कहते हैं, “ईश्वर किसी न किसी रूप में ज़रूर मदद भेजता है।” इस बेबस परिवार के लिए यह ‘ईश्वरीय रूप’ बनकर सामने आया गभाना के कैप्टन दुष्यंत सिंह का कन्यादान सुमंगल फाउंडेशन। जब फाउंडेशन को इस परिवार की बेटी के विवाह में आ रही मुश्किलों की जानकारी हुई, तो उन्होंने तत्परता दिखाई। उन्होंने न सिर्फ़ मदद का आश्वासन दिया, बल्कि बेटी को हंसी-खुशी विदा करने की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली।

खुशी के आँसुओं से विदाई की तैयारी

रविवार का दिन इस परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। फाउंडेशन के सदस्य बिना देर किए, पूरे उत्साह के साथ बेटी के घर पहुंचे। उन्होंने शादी से जुड़ा ज़रूरी घरेलू सामान जिसमें डबल बैड, बर्तन, कपड़े, ज्वैलरी और अन्य गृहस्थी के सामान शामिल थे, परिवार को भेंट किए। जैसे ही परिजनों ने देखा कि अभाव की जिस गठरी को वे अकेले ढो रहे थे, उसे आज फाउंडेशन के सदस्यों ने आकर हल्का कर दिया है, तो उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। यह केवल सामान नहीं था, यह उस पिता की टूटी हुई हिम्मत का सहारा था। इस नेक कार्य के बाद, फाउंडेशन ने साबित कर दिया कि “परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है।” कैप्टन दुष्यंत सिंह और उनकी टीम ने एक बार फिर साबित किया कि अगर इरादे नेक हों, तो समाज की बड़ी से बड़ी चिंता को दूर किया जा सकता है। अब यह परिवार 25 नवंबर को अपनी बेटी को गर्व और आनंद के साथ विदा करने को तैयार है।74 वीं बेटी का कन्यादान: फाउंडेशन ने दोहराया संकल्प

यह मदद फाउंडेशन के लिए कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह उनके परोपकार के महायज्ञ की निरंतरता है। फाउंडेशन के अध्यक्ष कैप्टन दुष्यंत सिंह ने इस अवसर पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि-

“असली दौलत वह नहीं जो तिजोरी में बंद हो, बल्कि वह है जो किसी की आँखों के आँसू पोंछ दे।

उन्होंने दृढ़ता से कहा कि, बेटी का कन्यादान लेने से बड़ा कोई धर्म और पुण्य नहीं होता है। यह सिर्फ एक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक आत्मिक संतोष है। इस नवीनतम सहयोग के साथ, कन्यादान सुमंगल फाउंडेशन अब तक कुल 74 बेटियों का सफलतापूर्वक कन्यादान कर चुका है। कैप्टन दुष्यंत सिंह ने आगे कहा, “हमारा यह बीड़ा निरंतर जारी रहेगा।” फाउंडेशन ने संकल्प लिया है कि जब तक समाज में किसी भी गरीब पिता के माथे पर बेटी की शादी को लेकर चिंता की एक भी लकीर रहेगी, तब तक वह इस पुनीत कार्य को इसी सेवाभाव के साथ संभाल कर रखेंगे। लोगों के सहयोग से उनका यह प्रयास समाज में एक प्रेरणास्रोत का काम कर रहा है।

सामाजिक सरोकार की मिसाल है फाउंडेशन

समाज के इस पुनीत कार्य की गूँज केवल लाभार्थी परिवार तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक प्रहरी माने जाने वाले पत्रकार जगत ने भी इस पहल को सलाम किया है। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के अलीगढ़ मंडल अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण सिंह ने संस्था के इस कर्मठ प्रयास की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि “जब साधन संपन्न हाथ, साधनहीन परिवार के आँसू पोंछने के लिए उठते हैं, तब समाज में विश्वास की नींव मजबूत होती है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि कन्यादान सुमंगल फाउंडेशन केवल सामान भेंट नहीं कर रहा है, बल्कि यह सामाजिक सहभागिता और इंसानियत की एक नई पाठशाला चला रहा है। आज के दौर में जब हर तरफ स्वार्थ हावी है, ऐसे में कैप्टन दुष्यंत सिंह के फाउंडेशन का यह भगीरथ प्रयास हर व्यक्ति और संस्था के लिए एक मूक संदेश है कि हमें अपने दायित्वों को व्यावसायिकता से ऊपर उठकर निभाना चाहिए। उन्होंने इस कार्य को मानवीय संवेदना की उत्कृष्ट मिसाल बताया।

यह रहे मौजूद

संरक्षक चौधरी अजय सिंह, सभासद भुवनेश गोयल, ठा. धर्मेंद्र सिंह, शालिनी चौहान, संजय जैन, नितिन वर्मा, प्रवीन शर्मा, लोकेंद्र कश्यप बंटी, अमित गोयल, घनेंद्र सिंह प्रधान, राजा सिंह, चेतन गुप्ता, विवेक शर्मा, लखपत माहौर, प्रिंस, नवीन गुप्ता, मुकेश गर्ग, दुर्गेश गोयल, सुरेश वर्मा डीलर आदि मौजूद रहे।

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