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त्याग और संघर्ष की प्रतिमूर्ति थीं झांसी की रानी

इगलास। परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा गांव तोछीगढ़ में जंग-ए-आजादी की महानायिका, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रान्ति की शहीद, महान वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जी की जयंती एवं विश्व की सबसे सशक्त महिलाओं में गिनी जाने वाली भारत गणराज्य की 4 – 4 बार प्रधानमंत्री बनने वाली देश की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी की जयंती (राष्ट्रीय एकता दिवस) पर बालिकाओं की वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।

प्रतियोगिता में ग्रामीण बालिकाओं ने खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया जिसमें जूनियर वर्ग में काजल व अनुष्का तथा सीनियर वर्ग में माधवी ने सराहनीय प्रदर्शन किया। संस्था की ओर से प्रतिभाशाली बालिकाओं को सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में नीरू पाराशर, सोनिया चौधरी, अंजली शर्मा व रेनू शर्मा निर्णायक की भूमिका में रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता मंजू कौशल ने की।संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने कहा कि लक्ष्मीबाई की वीरता और पराक्रम की वजह से उनका नाम जुबां पर आते ही हर भारत वासी के दिल में देश भक्ति उमड़ने लग जाती है। वो त्याग और संघर्ष की प्रतिमूर्ति थीं। उनका जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। उनकी शादी के कुछ सालों बाद ही बीमारी के कारण उनके पुत्र व उनके पति दोनों का ही देहांत हो गया। फिर उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया। ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी राज्य हड़प नीति के तहत बालक दामोदर राव के ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया। ब्रिटिश अधिकारियों ने राज्य को अपने अधीन करने की घोषणा कर दी। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होनें हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया। झाँसी 1857 के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। झलकारी बाई जो लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थी को उसने अपनी सेना में प्रमुख स्थान दिया। ओरछा और दतिया के राजाओं की मदद से 1858 में ब्रिटिश सेना ने झाँसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और दो हफ़्तों की लड़ाई के बाद ब्रिटिश सेना ने शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया। परन्तु रानी दामोदर राव के साथ अंग्रेज़ों से बच कर भाग निकलने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुँची और तात्या टोपे से मिलीं। तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से अंग्रेजी सेना से युद्ध किया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते ही रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गई थीं। उनकी बहादुरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लड़ाई की रिपोर्ट में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज़ ने टिप्पणी की थी कि “रानी लक्ष्मीबाई अपनी सुन्दरता, चालाकी और दृढ़ता के लिये उल्लेखनीय तो थी ही, विद्रोही नेताओं में सबसे अधिक ख़तरनाक भी थी।”

उन्नति उपाध्याय ने इंदिरा गांधी जी की जीवनी सुनाते हुए कहा कि इंदिरा जी देश की सबसे सशक्त महिलाओं में से एक हैं। उन्होंने आजीवन देशहित में काम करते हुए सदैव देश को गौरवान्वित किया। देश की एकता और अखंडता के लिए ही उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस अवसर पर शशि, विमलेश, राखी, पल्लवी, पूनम, रिचा, ग़ौरी, उमा, कनक, पुष्पा, हेमलता, माधुरी, साधना आदि मौजूद रहे।

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