भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक को दी श्रद्धांजलि
इगलास। परोपकार सामाजिक सेवा संस्था द्वारा गांव तोछीगढ में आज देश के प्रथम सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत देश के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं द्वितीय लेकिन अद्वितीय राष्ट्रपति देश के महानतम शिक्षाविद और पथप्रदर्शक सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। ग्रामीण विद्यार्थियों ने उनके छायाचित्र पर पुष्प अर्पित कर देश के समस्त शिक्षकों का अभिनंदन किया।
संस्था के अध्यक्ष जतन चौधरी ने कहा कि डॉ राधाकृष्णन जी स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे थे। वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। डॉ.राधाकृष्णन बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही देश की संस्कृति को प्यार करने वाले व्यक्ति भी थे। इनका जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतानी गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज से M A करने के बाद डॉ राधाकृष्णन जी ने 1909 में प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से बतौर सहायक अध्यापक अपना शिक्षक जीवन शुरू किया था और 1918 में मैसूर विश्वविद्यालय में फिलोसॉफी के प्रोफेसर के रूप में तैनात हुए उसके बाद 1921 में कोलकाता विश्वविद्यालय में फिलोसॉफी के प्रोफेसर, 1928 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में फिलोसॉफी पढ़ाई और 1931 में आंध्रा विश्वविद्यालय के कुलपति बने, 1939 से 1948 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार संभाला। 1949 में उन्हें भारत के प्रथम राजदूत के रूप में चुना गया। 1952 से 1962 तक डॉ राधाकृष्णन ने देश के उपराष्ट्रपति के रूप में ने आयाम प्रस्तुत किए और 1962 में भारत के द्वितीय राष्ट्रपति के रूप में देश का मान बढ़ाया। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1954 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। डॉ राधाकृष्णन, भारत रत्न से सम्मानित होने वाले प्रथम भारतीय नागरिक थे। इस अवसर पर पंकज सिंह, लखन कुमार, जय शर्मा, दीपक कुमार, चिंटू, पवन कुमार, भरत सिंह, यश, सूरज चौधरी, साधना सिंह आदि मौजूद रहे।