भगवान को पाने में बाधक है अहंकार- विजयकृष्ण
गभाना। नगर में मदनधाम कॉलोनी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा एवं ज्ञान यज्ञ में दूसरे दिन गुरुवार को कथा सम्राट डॉ. विजय कृष्ण चतुर्वेदी ने कहा कि भक्ति में अहंकार बाधक होता है, इसलिये पहले हमें अपने अहंकार को खत्म करना होगा तभी हमें प्रभु कृपा का फल प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि भागवत कथा अमृत के समान है इसके सामने देवताओं के फल भी तुच्छ हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भोजन में स्वाद नही होता, स्वाद भूख में होता है उसी प्रकार भक्ति की भावना में लीन भक्त को ईश्वर से मिलने की भूख होती है। उन्होंने कहा कि अगर हमें अपनी वाणी को पावन करना है तो ईश्वर का भजन करना चाहिए क्योंकि दोषी मन पाप करने को प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि कपिल भगवान ने माता देवहूति से कहा कि ये अशक्ति ही सुख-दुख का कारण है। यदि संसार में ये अशक्ति है, तो दु:ख का कारण बन जाती है। यही अशक्ति भगवान की भक्ति में हो जाए तो मोक्ष का द्वार खुल जाता है। उन्होंने बताया कि उनके शील गुण से प्रसन्न होकर भगवान ने प्रभुजी को उनकी रूचि के अनुसार दस हजार कानों की शक्ति प्राप्त करने का वरदान दिया, जिससे वे अर्धनिश प्रभु का गुणगान सुनते रहें। इसके बाद ऋषभ देव के चरित्र वर्णन करते हुए कहा कि मनुष्य को ऋषभ देव जी जैसा आदर्श पिता होना चाहिए। जिन्होंने अपने पुत्रों को समझाया कि इस मानव शरीर को पाकर दिव्य तप करना चाहिए, जिससे अंत:करण की शुद्धि हो तभी उसे अनंत सुख की प्राप्ति हो सकती है। भगवान को अर्पित भाव से किया गया कर्म ही दिव्य तप है।
उन्होंने सती प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे है वहां आपका, अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान हो। यदि ऐसा होने की आशंका हो तो उस स्थान पर जाना नहीं चाहिए। चाहे वह स्थान अपने जन्म दाता पिता का ही घर क्यों हो। कथा के दौरान सती चरित्र के प्रसंग को सुनाते हुए भगवान शिव की बात को नहीं मानने पर सती के पिता के घर जाने से अपमानित होने के कारण स्वयं को अग्नि में स्वाह होना पड़ा।
ध्रुव चरित्र की कथा को सुनाते हुए कहा कि ध्रुव की सौतेली मां सुरुचि के द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य संयम की नितांत आवश्यकता रहती है। भक्त ध्रुव द्वारा तपस्या कर श्रीहरि को प्रसन्न करने की कथा को सुनाते हुए बताया कि भक्ति के लिए कोई उम्र बाधा नहीं है। भक्ति को बचपन में ही करने की प्रेरणा देनी चाहिए क्योंकि बचपन कच्चे मिट्टी की तरह होता है उसे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। प्रह्लाद चरित्र के बारे में विस्तार से सुनाया और बताया कि भगवान नरसिंह रूप में लोहे के खंभे को फाड़कर प्रगट होना बताता है कि प्रह्लाद को विश्वास था कि मेरे भगवान इस लोहे के खंभे में भी है और उस विश्वास को पूर्ण करने के लिए भगवान उसी में से प्रकट हुए एवं हिरण्यकश्यप का वध कर प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की। कथा के दौरान उन्होंने विभिन्न धार्मिक प्रसंगों व भजनों की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। अायोजन में आयोजन में नीरज गुप्ता, कांतीलाल गुप्ता विनोद गुप्ता, वेदप्रकाश गुप्ता, अतुल गुप्ता, अमन गुप्ता, शिवकुमार गुप्ता, वेदप्रकाश शर्मा, नवीन गुप्ता, ललतेश अग्रवाल, महेश अग्रवाल, अमित गोयल, शिवकुमार गुप्ता, ज्ञानेंद्र सिंह, रमेश चंद्र पाठक, भुवनेश कुमार सिंह, शिवकांत रावत, रोहित राघव, नीरज सिंह, सुधा अग्रवाल, सुमन अग्रवाल, रमा अग्रवाल, तनु अग्रवाल, निधि अग्रवाल, मोनिका अग्रावल, अंजना अग्रवाल आदि मौजूद रहे।